लोक संस्कृतियों के निरूपण का विनम्र प्रयास

May 312014
 

लोकरंग 2014, एक यादगार आयोजन

कुशीनगर के एक साधारण से गांव, जोगिया जनूबी पट्टी में लोकरंग 2014 का भव्य और शानदार आयोजन, देश स्तर का शायद पहला आयोजन कहा जा सकता है, जहां लोक संस्कृतियों को सहेजने, उनके सामाजिक और जनपक्षधर स्वरूप को मंच पर प्रस्तुत कर, फूहड़पन के विरुद्ध एक अभियान चलाने जैसा पहल लिया गया है । जोगिया गांव विगत सात सालों से लोक-उत्सव का रूप ले चुका है । आकर्षक ढंग से भित्ति चित्रों से सजे जोगिया गांव के विशाल मुक्ताकाशी मंच पर लोकरंग-2014 में दो रात लोक नृत्य और गायकी के विभिन्न रूपों की प्रस्तुति के साथ-साथ ‘अमली’ और ‘चरणदास चोर’ नाटक देखने का मौका हजारों की संख्या में ग्रामीण जनता को मिला। इस बार मंच पर पंवारा और मुहर्रम के दौरान गाए जाने वाले जारी गीत की किसी मंच पर पहली प्रस्तुति भी हुई। गोबर और मिट्टी से डिजाइन किए गए मंच को आकर्षक स्वरूप प्रदान किया था, गाजीपुर से आये राजकुमार सिंह की टीम ने ।

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Aug 042012
 

लोक गायक और कलाकार, पुरबी के बादशाह स्वर्गीय महेन्दर मिसिर की स्मृति को समर्पित, कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा के गाँव जोगिया जनूबी पट्टी (कुशीनगर ) में गत १५-१६ मई को सम्पन्न  लोक-कलाओं का अनूठा रंगारंग समागम छठां लोकरंग-2013 देखते हुए रेणु की कहानियों की वह आत्मीय और रागपूर्ण दुनिया याद आ रही थी, जो जीवन को सामूहिकता और अन्तरंगता से जीने से बनी है . लोक-जीवन का वह भरोसा जो खेतों में साथ-साथ काम करने तथा असुविधाओं के बीच एक-दूसरे के दुख साझा करने और सुख बांटने से बनता है, इन लोक-नृत्यों के लोक -कलाकारों की दैहिक भाषा में भी जीवन के प्रति सकारात्मक एवं आशावादी दृष्टिकोण का एक अचेतन सन्देश संप्रेषित करा जाता है . एक संवादी मजाकिया अंदाज और हंसमुखता इन नृत्यों को वह रसमयता प्रदान करता है, जो अलगाव, उदासी और अहंकारी उपेक्षा की नगरीय सांस्कृतिक दृष्टि और उसकी पेशेवर बाजारू संस्कृति से बिलकुल अलग है. लोकरंग में शामिल लोक-नृत्यों को देखते हुए लगा कि प्राकृतिक पर्यावरण की तरह ही विनाश के खतरे के कगार पर पहुँचने के बावजूद लोक-नृत्यों के पास, नगरों की व्यावसायिक सभ्यता को देने के लिए बहुत कुछ अब भी शेष है . उसके पास वह मन, वह चित्त और आत्मा बची हुई है, जो उसके अवसादी चित्त में उल्लास के रंग भर सकता है. लोक के पास जो निरंतर श्रमशील संवादी चित्त है, साहचर्य को शिष्टाचार की तरह जीने वाला  जीवनानुभव है  तथा एक-दूसरे को जीने का सांस्कृतिक आग्रह है, वह लोक-कलाओं को शास्त्रीयता की दुरुहताओं से मुक्त लोक-धर्म ही बना देता है .

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Jul 062011
 

“सांस्कृतिक फूहड़पन और भड़ैंती के विरूद्ध”

लोककला का उत्सव और उत्सव का गांव के रूप में चर्चित जोगिया जनूबी पट्टी,आजकल चर्चा में है । यह गांव गौतम बुद्ध की निर्वाण स्थली कुशीनगर से लगभग 17 किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित एक छोटा सा कस्बा,फाजिलनगर से तीन किलोमीटर दूर है । राष्ट्रीयकृत मार्ग से एक ऊबड़-खाबड़, पगडण्डीनुमा सड़क जोगिया जनूबा पट्टी को जाती है । जोगिया जनूबी पट्टी हिन्दी कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा का पैतृक गांव है। उनके संयोजन में `लोकरंग सांस्कृतिक समिति ने एक नई सांस्कृतिक पहल ली गयी है ।

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 Posted by at 2:11 pm
Jul 042011
 

- उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान द्वारा काशी में आयोजित व्यास महोत्सव(28 से 2 दिसम्बर 2009) में, लोकरंग सांस्कृतिक समिति ने 29 नवम्बर, 2009 सांय 7 बजे अस्सी घाट पर ढाई घंटे का `लोकरंग´ कार्यक्रम प्रस्तुत किया जिसमें जांघिया नृत्य, फरी नृत्य और हिरावल, पटना की गायन टीमों ने देशी, विदेशी पर्यटकों को लोक गायकी एवं लोक नृत्त्य से सम्मोहित किया ।
-लोकरंग सांस्कृतिक समिति ने, ज.स.म.पटना के आमंत्रण पर ‘सृजनोत्तसव 2010′ में 14 मार्च 2010 को फरी नृत्य प्रस्तुत किया ।
नोट- लोकरंग सांस्कृतिक समिति जनपक्षधर संस्थाओं के आमंत्रण पर अन्यत्र भी कार्यक्रम प्रस्तुत कर सकती है बशर्ते कि उसके वैचारिक पक्ष को प्रभावित करने की कोशिश न की जाए ।

 Posted by at 3:35 pm